सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नन्दबाबा जिनके आंगन में खेलते हैं परमात्मा!!!!!!#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां_पंजाब #संगरिया #राजस्थानजो सभी को आनन्द देते हैं, वह हैं नन्द । नन्दबाबा सभी को चाहते हैं और सबका बहुत ध्यान रखते हैं; इसीलिए उनको सभी का आशीर्वाद मिलता है और परमात्मा श्रीकृष्ण उनके घर पधारते हैं । नन्दबाबा के सौभाग्य को दर्शाने वाला एक सुन्दर श्लोक है—श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमन्ये भजन्तु भवभीता: ।अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परब्रह्म ।।अर्थात्—संसार से भयभीत होकर कोई श्रुति (वेद) का आश्रय ले, तो दूसरा स्मृति (उपनिषदों) की शरण ग्रहण करे तो कोई तीसरा महाभारत (ग्रन्थ) की शरण में जाए; परन्तु हम तो नन्दबाबा की चरण-वन्दना करते हैं, जिनके आंगन में साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण खेलते हैं ।नन्दबाबा है श्रीकृष्ण के नित्य सिद्ध पिता!!!!!!गोलोक में #नन्दबाबा #भगवान श्रीकृष्ण के नित्य पिता हैं और भगवान के साथ ही निवास करते हैं । जब भगवान ने व्रजमण्डल को अपनी लीला भूमि बनाया तब गोप, गोपियां, #गौएं और पूरा व्रजमण्डल नन्दबाबा के साथ पहले ही पृथ्वी पर प्रकट हो गया।भगवान के नित्य-जन जब पृथ्वी पर पधारते हैं तो कोई-न-कोई प्राणी जो उनका अंश रूप होता है, उनसे एकाकार हो जाता है; इसीलिए पूर्वकल्प में वसु नाम के द्रोण और उनकी पत्नी धरादेवी ने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी से वर मांगा कि ‘जब श्रीहरि पृथ्वी पर प्रकट हों, तब हमारा उनमें पुत्र-भाव हो ।’ ब्रह्माजी के वरदान से द्रोण व्रज में नन्द हुए और धरादेवी यशोदा हुईं ।नन्दबाबा, वसुदेवजी और नौ नन्दयदुवंश के राजा देवमीढ़ मथुरा में रहते थे । उनकी दो पत्नियां थी । पहली पत्नी क्षत्रियकन्या थी जिनके पुत्र हुए शूरसेन और शूरसेन के पुत्र थे वसुदेवजी । राजा देवमीढ़ की दूसरी पत्नी वैश्यपुत्री थी जिनके पुत्र का नाम था पर्जन्य । इन्होंने यमुना के पार महावन में अपना निवास बनाया। ये व्रजमण्डल के सबसे बड़े माननीय गोप थे । इनके नौ पुत्र हुए जिन्हें ‘नौ नन्द’ कहा जाता है, जिनके नाम हैं—धरानन्द,ध्रुवनन्द,उपनन्द,अभिनन्द,नन्द,सुनन्द,कर्मानन्द,धर्मानन्द, और बल्लभजी।मझले होने पर भी भाइयों की सम्मत्ति से नन्दजी ‘व्रजेश्वर’—गोपों के नायक बने । प्रत्येक गोप के पास हजारों गौएं होती थीं । जहां गौएं रहती थीं, उसे ‘गोकुल’ कहते थे । नौ लाख गायों के स्वामी को ‘नन्द’ कहा जाता था।वसुदेवजी नन्दबाबा के भाई ही लगते थे और उनसे नन्दबाबा की बड़ी घनिष्ठ मित्रता थी । जब मथुरा में कंस का अत्याचार बढ़ने लगा, तब वसुदेवजी ने अपनी पत्नी रोहिणीजी को नन्दजी के यहां भेज दिया । श्रीकृष्ण को भी वसुदेवजी चुपचाप नन्दगृह में रख आए ।नन्दबाबा जिनके आंगन में खेलते हैं परमात्मा!!!!!!!!गोपराज नन्द समस्त समृद्धियों से सम्पन्न थे, पर उनके कोई पुत्र नहीं था । आयु का चौथापन था इसलिए उपनन्द आदि वृद्ध गोपों ने एक पुत्रेष्टि-यज्ञ का आयोजन किया । इधर बाहर यज्ञमण्डप ब्राह्मणों की वेदध्वनि से मुखरित था, उधर अंत:पुर में गोपराज नन्द यशोदाजी से कह रहे थे–’व्रजरानी ! मैं जिसको सदा अपने पुत्र के रूप में देखता हूँ, मैंने जिसको अपने मनोरथ पर बैठाया है और जिसको स्वप्न में देखा है, वह ‘अचल’ है । ऐसी असम्भव बात कहना पागलपन ही माना जाएगा । सुनो, मैं अपने मनोरथ में और स्वप्न में देखता हूँ दिव्यातिदिव्य नीलमणि सदृश्य श्यामसुन्दर वर्ण का एक बालक, जिसके चंचल नेत्र अत्यन्त विशाल हैं, वह तुम्हारी गोद में बैठकर भांति-भांति के खेल कर रहा है । उसे देखकर मैं अपने आपको खो देता हूँ । यशोदे ! सत्य बताओ, क्या कभी तुमने भी स्वप्न में इस बालक को देखा है ?’गोपराज की बात सुनकर यशोदाजी आनन्दविह्वल होकर कहने लगीं–’व्रजराज ! मैं भी ठीक ऐसे ही बालक को सदा अपनी गोद में खेलते देखती हूँ । मैंने भी अति असंभव समझकर कभी आपको यह बात नहीं बतायी । कहां मैं क्षुद्र स्त्री और कहां दिव्य नीलमणि ।’ नन्दबाबा ने कहा–भगवान नारायण की कृपादृष्टि से इस दुर्लभ-सी मनोकामना का पूर्ण होना असंभव नहीं है । अत: नन्द-दम्पत्ति ने एक वर्ष के लिए श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय द्वादशी तिथि के व्रत का नियम ले लिया ।नन्द-यशोदा के द्वादशी-व्रत की संख्या बढ़ने के साथ-ही-साथ स्वप्न में देखे हुए परम सुन्दर दिव्य बालक को पुत्र रूप में प्राप्त करने की लालसा भी बढ़ती गई । व्रत-अनुष्ठान पूर्ण होने पर एक दिन उन्होंने अपने इष्टदेव चतुर्भुज नारायण को स्वप्न में उनसे कहते सुना–’द्रोण और धरारूप से तप करके तुम दोनों जिस फल को प्राप्त करना चाहते थे, उसी फल का आस्वादन करने के लिए तुम दोनों स्वयं पृथ्वी पर प्रकट हुए हो। शीघ्र ही तुम लोगों का वह सुन्दर मनोरथ सफल होगा।’ भगवान के वचनों को सुनकर नन्द-यशोदा उस सुन्दर बालक को पुत्ररूप में प्राप्त करने की प्रतीक्षा करने लगे ।भगवान पहले नन्दबाबा के हृदय में आए और फिर स्वप्न में दीखा हुआ बालक एक बिजली-सी चमकती हुई बालिका के साथ नन्दहृदय से निकल कर यशोदाजी के हृदय में प्रवेश कर गया । आठ महीनों के बाद भाद्रप्रद मास की कृष्णाष्टमी के दिन नन्दनन्दन का प्राकट्य हो गया और व्रजराज का वंश चलने से व्रज को आधार-स्तम्भ मिल गया ।नन्दबाबा को हुआ श्रीकृष्ण के स्वरूप का ज्ञान!!!!!!एक दिन नन्दबाबा एकादशी का व्रत करके द्वादशी के दिन आधी रात को यमुना में स्नान करने आए । उस समय वरुण के दूतों ने उन्हें पकड़ लिया और वरुणलोक में ले गए । दूसरे दिन प्रात:काल गोप नन्दजी को नहीं देखकर विलाप करने लगे । सर्वान्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण सब बातें जान कर वरुण लोक गए । वहां वरुणदेव ने उनकी पूजा की और अपने दूतों की धृष्टता के लिए माफी मांगी । तब भगवान नन्दबाबा को लेकर व्रज में आए तो उन्हें विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण देवताओं के कार्य के लिए अवतीर्ण होने वाले साक्षात् पुरुषोत्तम ही हैं ।इसी प्रकार एक बार नन्दजी शिवरात्रि को सब गोपों के साथ अम्बिकावन में देवीपूजा के लिए गए । वहां रात्रि में सोते समय नन्दजी को एक अजगर ने पकड़ लिया । गोपों ने उसे जलती लकड़ी से बहुत मारा, पर वह गया नहीं । तब भगवान श्रीकृष्ण ने पैर के अंगूठे से उसे छू दिया । छूते ही वह गन्धर्व बन गया और उसकी सद्गति हो गयी ।श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने से विरह में व्रजवासियों की बड़ी आर्त दशा हो गई । एक दिन श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा ज्ञानी उद्धव से कहा–हे उद्धव ! तुम शीघ्र ही व्रज जाओ, ब्रह्मज्ञान का संदेश सुनाकर व्रजवासियों का ताप हरो । उद्धवजी व्रज में आए और दस मास यहीं रहे । नन्दबाबा से विदा लेते समय उद्धवजी ने उन्हें समझाने की चेष्टा की—‘श्रीकृष्ण किसी के पुत्र नहीं हैं, वे तो स्वयं भगवान हैं ।’ पिता के वात्सल्य से अभिभूत नन्दबाबा ने कहा–’तुम्हारे मत से श्रीकृष्ण ईश्वर हैं, अच्छा, वैसा ही हो । उस कृष्णरूपी परमेश्वर में मेरी रति और मति सदैव लगीं रहे।’ ऐसा कहते ही नन्दरायजी की आंखों से अश्रुओं की झड़ी लग गई।नन्दबाबा वात्सल्यरस के अधिदेवता!!!!!एक बार सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में पूरा व्रजमण्डल और द्वारकावासी एकत्र हुए । उस समय का कितना करुणापूर्ण दृश्य था जब नन्दबाबा ने अपने प्यारे कन्हैया को गोदी में बिठाकर उनका मुख चूमा । उस चुम्बन में कितनी विरह-वेदना, कितनी अतीत की स्मृतियां बसीं थीं इसे कौन जान सकता है ? कुरुक्षेत्र से लौटने पर भगवान श्रीकृष्ण के निज धाम पधारने पर व्रजमण्डल, ग्वाल-बाल, गोप-गोपियां, गौ-बछड़े, दिव्य वृक्ष, लता आदि नन्दबाबा के साथ अपने सनातन गोलोक को चले गए, जहां न बुढ़ापा है न रोग, न ही है मृत्यु का भय । बस है तो चारों तरफ सच्चिदानन्द आनन्दघन श्रीकृष्ण का आनन्द-ही-आनन्द।#वनिता_कासनियां_पंजाब 🙏🙏❤️❤️ राधे राधे ❤️मैं कभी जन्मा नहीं.... मैं अमर हूँ पार्थ,मैं ही सबसे पहले हूँ,, और मैं ही सबके बाद...!!🙏 🙏🌹जय #श्री #राधे #कृष्णा 🌹🙏🙏

नन्दबाबा जिनके आंगन में खेलते हैं परमात्मा!!!!!!#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां_पंजाब #संगरिया #राजस्थानजो सभी को आनन्द देते हैं, वह हैं नन्द । नन्दबाबा सभी को चाहते हैं और सबका बहुत ध्यान रखते हैं; इसीलिए उनको सभी का आशीर्वाद मिलता है और परमात्मा श्रीकृष्ण उनके घर पधारते हैं । नन्दबाबा के सौभाग्य को दर्शाने वाला एक सुन्दर श्लोक है—श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमन्ये भजन्तु भवभीता: ।अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परब्रह्म ।।अर्थात्—संसार से भयभीत होकर कोई श्रुति (वेद) का आश्रय ले, तो दूसरा स्मृति (उपनिषदों) की शरण ग्रहण करे तो कोई तीसरा महाभारत (ग्रन्थ) की शरण में जाए; परन्तु हम तो नन्दबाबा की चरण-वन्दना करते हैं, जिनके आंगन में साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण खेलते हैं ।नन्दबाबा है श्रीकृष्ण के नित्य सिद्ध पिता!!!!!!गोलोक में #नन्दबाबा #भगवान श्रीकृष्ण के नित्य पिता हैं और भगवान के साथ ही निवास करते हैं । जब भगवान ने व्रजमण्डल को अपनी लीला भूमि बनाया तब गोप, गोपियां, #गौएं और पूरा व्रजमण्डल नन्दबाबा के साथ पहले ही पृथ्वी पर प्रकट हो गया।भगवान के नित्य-जन जब पृथ्वी पर पधारते हैं तो कोई-न-कोई प्राणी जो उनका अंश रूप होता है, उनसे एकाकार हो जाता है; इसीलिए पूर्वकल्प में वसु नाम के द्रोण और उनकी पत्नी धरादेवी ने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी से वर मांगा कि ‘जब श्रीहरि पृथ्वी पर प्रकट हों, तब हमारा उनमें पुत्र-भाव हो ।’ ब्रह्माजी के वरदान से द्रोण व्रज में नन्द हुए और धरादेवी यशोदा हुईं ।नन्दबाबा, वसुदेवजी और नौ नन्दयदुवंश के राजा देवमीढ़ मथुरा में रहते थे । उनकी दो पत्नियां थी । पहली पत्नी क्षत्रियकन्या थी जिनके पुत्र हुए शूरसेन और शूरसेन के पुत्र थे वसुदेवजी । राजा देवमीढ़ की दूसरी पत्नी वैश्यपुत्री थी जिनके पुत्र का नाम था पर्जन्य । इन्होंने यमुना के पार महावन में अपना निवास बनाया। ये व्रजमण्डल के सबसे बड़े माननीय गोप थे । इनके नौ पुत्र हुए जिन्हें ‘नौ नन्द’ कहा जाता है, जिनके नाम हैं—धरानन्द,ध्रुवनन्द,उपनन्द,अभिनन्द,नन्द,सुनन्द,कर्मानन्द,धर्मानन्द, और बल्लभजी।मझले होने पर भी भाइयों की सम्मत्ति से नन्दजी ‘व्रजेश्वर’—गोपों के नायक बने । प्रत्येक गोप के पास हजारों गौएं होती थीं । जहां गौएं रहती थीं, उसे ‘गोकुल’ कहते थे । नौ लाख गायों के स्वामी को ‘नन्द’ कहा जाता था।वसुदेवजी नन्दबाबा के भाई ही लगते थे और उनसे नन्दबाबा की बड़ी घनिष्ठ मित्रता थी । जब मथुरा में कंस का अत्याचार बढ़ने लगा, तब वसुदेवजी ने अपनी पत्नी रोहिणीजी को नन्दजी के यहां भेज दिया । श्रीकृष्ण को भी वसुदेवजी चुपचाप नन्दगृह में रख आए ।नन्दबाबा जिनके आंगन में खेलते हैं परमात्मा!!!!!!!!गोपराज नन्द समस्त समृद्धियों से सम्पन्न थे, पर उनके कोई पुत्र नहीं था । आयु का चौथापन था इसलिए उपनन्द आदि वृद्ध गोपों ने एक पुत्रेष्टि-यज्ञ का आयोजन किया । इधर बाहर यज्ञमण्डप ब्राह्मणों की वेदध्वनि से मुखरित था, उधर अंत:पुर में गोपराज नन्द यशोदाजी से कह रहे थे–’व्रजरानी ! मैं जिसको सदा अपने पुत्र के रूप में देखता हूँ, मैंने जिसको अपने मनोरथ पर बैठाया है और जिसको स्वप्न में देखा है, वह ‘अचल’ है । ऐसी असम्भव बात कहना पागलपन ही माना जाएगा । सुनो, मैं अपने मनोरथ में और स्वप्न में देखता हूँ दिव्यातिदिव्य नीलमणि सदृश्य श्यामसुन्दर वर्ण का एक बालक, जिसके चंचल नेत्र अत्यन्त विशाल हैं, वह तुम्हारी गोद में बैठकर भांति-भांति के खेल कर रहा है । उसे देखकर मैं अपने आपको खो देता हूँ । यशोदे ! सत्य बताओ, क्या कभी तुमने भी स्वप्न में इस बालक को देखा है ?’गोपराज की बात सुनकर यशोदाजी आनन्दविह्वल होकर कहने लगीं–’व्रजराज ! मैं भी ठीक ऐसे ही बालक को सदा अपनी गोद में खेलते देखती हूँ । मैंने भी अति असंभव समझकर कभी आपको यह बात नहीं बतायी । कहां मैं क्षुद्र स्त्री और कहां दिव्य नीलमणि ।’ नन्दबाबा ने कहा–भगवान नारायण की कृपादृष्टि से इस दुर्लभ-सी मनोकामना का पूर्ण होना असंभव नहीं है । अत: नन्द-दम्पत्ति ने एक वर्ष के लिए श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय द्वादशी तिथि के व्रत का नियम ले लिया ।नन्द-यशोदा के द्वादशी-व्रत की संख्या बढ़ने के साथ-ही-साथ स्वप्न में देखे हुए परम सुन्दर दिव्य बालक को पुत्र रूप में प्राप्त करने की लालसा भी बढ़ती गई । व्रत-अनुष्ठान पूर्ण होने पर एक दिन उन्होंने अपने इष्टदेव चतुर्भुज नारायण को स्वप्न में उनसे कहते सुना–’द्रोण और धरारूप से तप करके तुम दोनों जिस फल को प्राप्त करना चाहते थे, उसी फल का आस्वादन करने के लिए तुम दोनों स्वयं पृथ्वी पर प्रकट हुए हो। शीघ्र ही तुम लोगों का वह सुन्दर मनोरथ सफल होगा।’ भगवान के वचनों को सुनकर नन्द-यशोदा उस सुन्दर बालक को पुत्ररूप में प्राप्त करने की प्रतीक्षा करने लगे ।भगवान पहले नन्दबाबा के हृदय में आए और फिर स्वप्न में दीखा हुआ बालक एक बिजली-सी चमकती हुई बालिका के साथ नन्दहृदय से निकल कर यशोदाजी के हृदय में प्रवेश कर गया । आठ महीनों के बाद भाद्रप्रद मास की कृष्णाष्टमी के दिन नन्दनन्दन का प्राकट्य हो गया और व्रजराज का वंश चलने से व्रज को आधार-स्तम्भ मिल गया ।नन्दबाबा को हुआ श्रीकृष्ण के स्वरूप का ज्ञान!!!!!!एक दिन नन्दबाबा एकादशी का व्रत करके द्वादशी के दिन आधी रात को यमुना में स्नान करने आए । उस समय वरुण के दूतों ने उन्हें पकड़ लिया और वरुणलोक में ले गए । दूसरे दिन प्रात:काल गोप नन्दजी को नहीं देखकर विलाप करने लगे । सर्वान्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण सब बातें जान कर वरुण लोक गए । वहां वरुणदेव ने उनकी पूजा की और अपने दूतों की धृष्टता के लिए माफी मांगी । तब भगवान नन्दबाबा को लेकर व्रज में आए तो उन्हें विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण देवताओं के कार्य के लिए अवतीर्ण होने वाले साक्षात् पुरुषोत्तम ही हैं ।इसी प्रकार एक बार नन्दजी शिवरात्रि को सब गोपों के साथ अम्बिकावन में देवीपूजा के लिए गए । वहां रात्रि में सोते समय नन्दजी को एक अजगर ने पकड़ लिया । गोपों ने उसे जलती लकड़ी से बहुत मारा, पर वह गया नहीं । तब भगवान श्रीकृष्ण ने पैर के अंगूठे से उसे छू दिया । छूते ही वह गन्धर्व बन गया और उसकी सद्गति हो गयी ।श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने से विरह में व्रजवासियों की बड़ी आर्त दशा हो गई । एक दिन श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा ज्ञानी उद्धव से कहा–हे उद्धव ! तुम शीघ्र ही व्रज जाओ, ब्रह्मज्ञान का संदेश सुनाकर व्रजवासियों का ताप हरो । उद्धवजी व्रज में आए और दस मास यहीं रहे । नन्दबाबा से विदा लेते समय उद्धवजी ने उन्हें समझाने की चेष्टा की—‘श्रीकृष्ण किसी के पुत्र नहीं हैं, वे तो स्वयं भगवान हैं ।’ पिता के वात्सल्य से अभिभूत नन्दबाबा ने कहा–’तुम्हारे मत से श्रीकृष्ण ईश्वर हैं, अच्छा, वैसा ही हो । उस कृष्णरूपी परमेश्वर में मेरी रति और मति सदैव लगीं रहे।’ ऐसा कहते ही नन्दरायजी की आंखों से अश्रुओं की झड़ी लग गई।नन्दबाबा वात्सल्यरस के अधिदेवता!!!!!एक बार सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में पूरा व्रजमण्डल और द्वारकावासी एकत्र हुए । उस समय का कितना करुणापूर्ण दृश्य था जब नन्दबाबा ने अपने प्यारे कन्हैया को गोदी में बिठाकर उनका मुख चूमा । उस चुम्बन में कितनी विरह-वेदना, कितनी अतीत की स्मृतियां बसीं थीं इसे कौन जान सकता है ? कुरुक्षेत्र से लौटने पर भगवान श्रीकृष्ण के निज धाम पधारने पर व्रजमण्डल, ग्वाल-बाल, गोप-गोपियां, गौ-बछड़े, दिव्य वृक्ष, लता आदि नन्दबाबा के साथ अपने सनातन गोलोक को चले गए, जहां न बुढ़ापा है न रोग, न ही है मृत्यु का भय । बस है तो चारों तरफ सच्चिदानन्द आनन्दघन श्रीकृष्ण का आनन्द-ही-आनन्द।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

   बलुवाना न्यूज पंजाब 7 किलो चूरा पोस्त सहित ड्राईवर-कंडक्टर काबू अबोहर, 20 दिसंबर (बलुवाना न्यूज पंजाब):  फिरोजपुर के डीआईजी रणजीत सिंह, फाजिल्का के एसएसपी भूपिंद्र सिंह के दिशा निर्देशों पर एसपीडी गुरविंद्र सिंह संघा,  डीएसपी बल्लुआना विभोर शर्मा, डीएसपी अबोहर सुखविंद्र सिंह बराड़ द्वारा जिले को नशामुक्त करने तथा असामाजिक तत्वों के खिलाफ चलाए गए अभियान के तहत उनके दिशा निर्देशों का पालन करते हुए थाना सदर के प्रभारी इकबाल सिंह, एएसआई गुरमेल सिंह, जसविंद्र सिंह दौराने गश्त सैयदांवाली के निकट नाकाबंदी कर रखी थी कि सामने से एक कैंटर पीबी 10एचजी 2717 आता दिखाई दिया। शक के आधार पर कैंटर को रोककर तलाशी ली तो उसमें से 7 किलो चूरा पोस्त बरामद हुई। पकड़े गए आरोपी की पहचान हरमनजीत सिंह व जतिंद्रपाल सिंह पुत्रान कुलदीप सिंह वासी चिमना थाना सदर जगरावां जिला लुधियाना देहाती के रूप में हुई। दोनों आरोपियों के खिलाफ सदर थाना अबोहर में मामला दर्ज किया गया। दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर लिया गया है। फोटो: 1, जानकारी देती पुलिस, पकड़े गए आरोपी व बरामद कैंटर baluw...

❁══❁❁═ ══❁❁══❁❁ राधे माला किर्तन पोस्ट ❁❁══❁❁═ ══❁❁══❁हे कृष्ण🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏सुना है , आँखों मे तेरी , प्रेम समन्दर बसते हैं । फिर भी हम, एक बून्द , पानी को तरसते हैं ।🌹मिटा दो , जन्मों जन्मों की प्यास , साँवरे। 💐🪻प्रेम उत्सव मे बीत जाये , जीवन डगर प्यारे।🌹🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।भक्तो की तुमने विपदा टारी मुझे भी आके थाम मुरलीवाले।।🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷विघ्न बनाये तुमने, कर पार मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸पतझड़ है मेरा जीवन, बन के बहार आजा।सुन ले पुकार कान्हा, बस एक बार आजा।बैचैन मन के तुम ही, आराम मुरली वाले॥💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥तुम हो दया के सागर, जनमों की मैं हूँ प्यासी।दे दो जगह मुझे भी, चरणों में बस ज़रा सी।सुबह तुम ही हो, तुम ही, मेरी शाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले।मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿रूप सलोना देख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई,कमली श्याम दी कमली,कमली श्याम दी कमली।।🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻सखी पनघट पर यमुना के तट पर,लेकर पहुंची मटकी,भूल गई सब एक बार जब,छवि देखि नटखट की,देखत ही मैं हुई बाँवरी,उसी रूप में खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁कदम के नीचे अखियाँ मीचे,खड़ा था नन्द का लाला,मुख पर हंसी हाथ में बंसी,मोर मुकुट गल माला,तान सुरीली मधुर नशीली,तन मन दियो भिगोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹सास ननन्द मोहे पल-पल कोसे,हर कोई देवे ताने,बीत रही क्या मुझ बिरहन पर,ये कोई नहीं जाने,पूछे सब निर्दोष बावरी,तट पर काहे गई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️रूप सलोना दैख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई।।🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺रूप सलोना देख श्याम का,सुधबुध मेरी खोई,नी मैं कमली होई,नी मैं कमली होई,कमली श्याम दी कमली,कमली श्याम दी कमली।।#Vnitaराधे राधे 🌲🙏🌲🙏🌲🙏🌲🙏🌲#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #टीम #द्वारका जी जाते हुए ◢█◈★◈■⚀■◈★◈█◣GOOD MORNING DOS ⫷▓▓▓(✴ ✴)▓▓▓ ◥█◈★◈■⚀■◈★◈ ██ ◥◤★ 💕कुछ गहरा सा लिखना था___❦︎ इश्क से ज्यादा क्या लिखूं,❦︎❣︎_____सुनो अब #जिंदगी _लिखनी है___ #तुमसे_ज्यादा क्या लिखूं..!! 🍒🌷 नस_नस मे #नशा है ते हर #सांस को तेरी ही #तलब है, ऐसे मे 🥰 अब दूर कैसे रहूँ #तुझसे तू ही #इश्क मेरा, 🥰तू ही #मोहब्बत है।❣️💞तोड़ दूँ.....सारी 🥰 “बंदिशें और 😘 तुझसे लिपट......जाऊं..!❣️💞💖सुन.....लूँ तेरी “धड़कन“🥰 और....तेरी 😘बाहों में सिमट जाऊं..!💞💞❣️छू लूँ🥰 मेरे “सांसो“ से..... तेरे “सांसो तेरी...... हर सांस में घुल 😘जाऊं..!💞 💞💖तेरे 🥰 "दिल" में... उतर कर, तेरी.... "रूह" से मिल 😘जाऊं..!!💞 #Vnita 🖤♦️━━•❣️•✮✮┼ ◢ ▇ ◣ ♥️ ◢ ▇ ▇ ▇ ▇ ◣ ◢ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ▇ ▇ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ▇ ▇ ◥ ▇ ▇ ◥ ╔══❤️═ ♥️ #कान्हा ╚══❤️═राधे रादेधे═╝♥️═╗ ◤ ◤ ◤ ◤ ▇ ◣┼✮┼✮━━♦️💖🖤💖 ❣️“ को,💖 को,💞“💖 मै,💖रा 💖🍒🌷💖❣︎◥◤◥◤ ██████◤⫸ TO

 ❁══❁❁═ ══❁❁══❁ ❁ राधे माला किर्तन पोस्ट ❁ ❁══❁❁═ ══❁❁══❁ हे कृष्ण🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 सुना है , आँखों मे तेरी , प्रेम समन्दर बसते हैं ।   फिर भी हम, एक बून्द , पानी को तरसते हैं ।🌹 मिटा दो , जन्मों जन्मों की प्यास , साँवरे। 💐🪻 प्रेम उत्सव मे बीत जाये , जीवन डगर प्यारे।🌹 🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴 मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥ मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले। भक्तो की तुमने विपदा टारी मुझे भी आके थाम मुरलीवाले।। 🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷 विघ्न बनाये तुमने, कर पार मुरली वाले॥ मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले। मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥ 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 पतझड़ है मेरा जीवन, बन के बहार आजा। सुन ले पुकार कान्हा, बस एक बार आजा। बैचैन मन के तुम ही, आराम मुरली वाले॥ 💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦 मुझे चरणों से लगा ले, मेरे श्याम मुरली वाले। मेरी सांस सांस में तेरा, है नाम मुरली वाले॥ 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 तुम हो दया के सागर, जनमों की मैं हूँ प्यासी। दे दो जगह मुझे भी, चरणों में बस ज़रा सी। सुबह तुम ही ...

कभी विष्णु कभी शिव बन भक्त को छकाते भगवान भक्तों को आनन्द और शिक्षा देने के लिए होती है भगवान की लीला!!!!!!! By वनिता कासनियां पंजाब ?तीन बार ऐसा हुआ कि नरहरि सुनार को आंखें बंद करने पर शंकर और आंखें खोलने पर विट्ठल भगवान के दर्शन होते थे । तब नरहरि सुनार को आत्मबोध हुआ कि जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल हैं, वे ही शंकर हैं, दोनों एक ही हरिहर हैं । भगवान शिव और विष्णु की एकता दर्शाती एक मनोरंजक भक्ति कथा,,,,,,इस कथा को लिखने का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि भगवान विष्णु और शंकर में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं । भगवान शंकर और विष्णु वास्तव में दो घड़ों में रखे हुए जल की भांति हैं । जल एक ही है, सिर्फ घड़े दो हैं । इसी भाव को लोगों तक पहुंचाने के लिए भगवान शंकर ने अपने भक्त नरहरि सुनार के साथ एक लीला की । भगवान जब कोई लीला करते हैं तो उसके पीछे कोई महान शिक्षा या आदर्श छिपा रहता है और भक्तों को उससे आनन्द मिलता है ।नरहरि सुनार : शिव भक्त पर विष्णु द्रोहीपुराने समय में पण्ढरपुर में नरहरि सुनार नाम के ऐसे शिव भक्त हुए जिन्होंने पण्ढरपुर में रहकर भी कभी पण्ढरीनाथ श्रीपाण्डुरंग के दर्शन नहीं किए । उनकी ऐसी विलक्षण शिवभक्ति थी । लेकिन भगवान को जिसे अपने दर्शन देने होते हैं, वे कोई-न-कोई लीला रच ही देते हैं ।भगवान की लीला से एक व्यक्ति इन्हें श्रीविट्ठल (भगवान विष्णु) की कमर की करधनी बनाने के लिए सोना दे गया और उसने भगवान की कमर का नाप बता दिया । नरहरि ने करधनी तैयार की, पर जब वह भगवान को पहनाई गयी तो वह चार अंगुल बड़ी हो गयी । उस व्यक्ति ने नरहरि से करधनी को चार अंगुल छोटा करने को कहा । करधनी सही करके जब दुबारा श्रीविट्ठल को पहनाई गयी तो वह इस बार चार अंगुल छोटी निकली । फिर करधनी चार अंगुल बड़ी की गयी तो वह भगवान को चार अंगुल बड़ी हो गयी । फिर छोटी की गयी तो वह चार अंगुल छोटी हो गयी । इस तरह करधनी को चार बार छोटा-बड़ा किया गया ।आंखों पर पट्टी बांधकर नरहरि ने लिया भगवान का नाप!!!!!!लाचार होकर नरहरि सुनार ने स्वयं चलकर श्रीविट्ठल का नाप लेने का निश्चय किया । पर कहीं भगवान के दर्शन न हो जाएं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली । हाथ बढ़ाकर जो वह मूर्ति की कमर टटोलने लगे तो उनके हाथों को पांच मुख, दस हाथ, सर्प के आभूषण, मस्तक पर जटा और जटा में गंगा—इस तरह की शिवजी की मूर्ति का अहसास हुआ । उनको विश्वास हो गया कि ये तो उनके आराध्य भगवान शंकर ही हैं ।उन्होंने अपनी आंखों की पट्टी खोल दी और ज्यों ही मूर्ति को देखा तो उन्हें श्रीविट्ठल के दर्शन हुए । फिर आंखें बंद करके मूर्ति को टटोला तो उन्हें पंचमुख, चन्द्रशेखर, गंगाधर, नागेन्द्रहाराय श्रीशंकर का स्वरूप प्रतीत हुआ।आंखें बंद करने पर शंकर, आंखें खोलने पर विट्ठल!!!!!!!तीन बार ऐसा हुआ कि आंखें बंद करने पर शंकर और आंखें खोलने पर नरहरि सुनार को विट्ठल भगवान के दर्शन होते थे । तब नरहरि सुनार को आत्मबोध हुआ कि जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल हैं, वे ही शंकर हैं, दोनों एक ही हरिहर हैं ।अभी तक उनकी जो भगवान शंकर और विष्णु में भेदबुद्धि थी, वह दूर हो गयी और उनका दृष्टिकोण व्यापक हो गया । अब वे भगवान विट्ठल के भक्तों के ‘बारकरी मण्डल’ में शामिल हो गए । सुनार का व्यवसाय करते हुए हुए भी इन्होंने अभंग (भगवान विट्ठल या बिठोवा की स्तुति में गाए गए छन्द) की रचना की । इनके एक अभंग का भाव कितना सुन्दर है—‘भगवन् ! मैं आपका एक सुनार हूँ, आपके नाम का व्यवहार (व्यवसाय) करता हूँ । यह गले का हार देह है, इसका अन्तरात्मा सोना है। त्रिगुण का सांचा बनाकर उसमें ब्रह्मरस भर दिया । विवेक का हथौड़ा लेकर उससे काम-क्रोध को चूर किया और मनबुद्धि की कैंची से राम-नाम बराबर चुराता रहा । ज्ञान के कांटे से दोनों अक्षरों को तौला और थैली में रखकर थैली कंधे पर उठाए रास्ता पार कर गया। यह नरहरि सुनार, हे हरि ! तेरा दास है, रातदिन तेरा ही भजन करता है ।’शिव-द्रोही वैष्णवों को और विष्णु-द्वेषी शैवों को इस कथा से सीख लेनी चाहिए ।पद्मपुराण पा ११४।१९२ में भगवान शंकर विष्णुजी से कहते हैं—न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोऽस्ति भगवन् हरे ।पार्वती वा त्वया तुल्या न चान्यो विद्यते मम ।।अर्थात्—औरों की तो बात ही क्या, पार्वती भी मुझे आपके समान प्रिय नहीं है ।इस पर भगवान विष्णु ने कहा—‘शिवजी मेरे सबसे प्रिय हैं, वे जिस पर कृपा नहीं करते उसे मेरी भक्ति प्राप्त नहीं होती है ।’कूर्मपुराण में ब्रह्माजी ने कहा है—‘जो लोग भगवान विष्णु को शिवशंकर से अलग मानते हैं, वे मनुष्य नरक के भागी होते हैं ।’* सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥भावार्थ:- जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। शंकरजी से विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है॥* संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥भावार्थ:- जिनको शंकरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं॥

कभी विष्णु कभी शिव बन भक्त को छकाते भगवान भक्तों को आनन्द और शिक्षा देने के लिए होती है भगवान की लीला!!!!!!! By  वनिता कासनियां पंजाब  ? तीन बार ऐसा हुआ कि नरहरि सुनार को आंखें बंद करने पर शंकर और आंखें खोलने पर विट्ठल भगवान के दर्शन होते थे । तब नरहरि सुनार को आत्मबोध हुआ कि जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल हैं, वे ही शंकर हैं, दोनों एक ही हरिहर हैं । भगवान शिव और विष्णु की एकता दर्शाती एक मनोरंजक भक्ति कथा,,,,,, इस कथा को लिखने का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि भगवान विष्णु और शंकर में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं । भगवान शंकर और विष्णु वास्तव में दो घड़ों में रखे हुए जल की भांति हैं । जल एक ही है, सिर्फ घड़े दो हैं । इसी भाव को लोगों तक पहुंचाने के लिए भगवान शंकर ने अपने भक्त नरहरि सुनार के साथ एक लीला की । भगवान जब कोई लीला करते हैं तो उसके पीछे कोई महान शिक्षा या आदर्श छिपा रहता है और भक्तों को उससे आनन्द मिलता है । नरहरि सुनार : शिव भक्त पर विष्णु द्रोही पुराने समय में पण्ढरपुर में नरहरि सुनार नाम के ऐसे शिव भक्त हुए जिन्होंने पण्ढरपुर में रहकर ...