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राधे राधे ?गीता के अनुसार, जीव संसार में लौट कर क्यों आता है ? By वनिता कासनियां पंजाब गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अन्तकाल के चिंतन का महत्व बतलाते हुए अर्जुन को निरन्तर अपना चिंतन करने की आज्ञा देते हैं ।अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय ।। (गीता ८।५)अर्थात्—जो पुरुष अन्तकाल में मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है—इसमें कुछ संशय नहीं है।मनुष्य को जीवन में जिससे आसक्ति या मोह होता है, या उसके मन का सबसे अधिक आकर्षण जहां है, अंत समय में उसे वही स्मरण होगा । मृत्यु के समय मनुष्य सबसे अंत में जो विचार करता है अथवा जिसका चिन्तन करता है, उसका अगला जन्म उसी प्रकार का होता है ।यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ।। (गीता ८।६)अर्थात्—हे कुन्तीपुत्र ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।जीव संसार में लौट कर क्यों आता है ?संसार की चीजों जैसे—घर, परिवार, जमीन, पत्नी, पुत्र, पशु-पक्षी आदि में अपनापन, ममता या आसक्ति कर लेने से मनुष्य का मन संसार में बंध जाता है तो फिर भगवान उसको वैसा ही मौका दे देते हैं अर्थात् शरीर छूटने पर ममता के कारण संसार में जन्म दे देते हैं और जीव को विवश होकर संसार में लौटकर आना पड़ता है । किन्तु जिसको सांसारिक चीजों में आसक्ति न होकर भगवान से प्रेम है, वह भगवान को प्राप्त हो जाता है ।राजा भरत की कथा!!!!!!!भगवान ऋषभदेव के पुत्र सम्राट भरत महान त्यागी, भगवद्भक्त व पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट थे । उनके नाम पर ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा । पहले इस देश का नाम अजनाभवर्ष था । अंत समय में मृगशावक (हिरन के बच्चे) का स्मरण करने से उन्हें अगले जन्म में मृग होना पड़ा ।समस्त भूमण्डल के सम्राट भरत ने भगवान के भजन के लिए राज्य का त्याग कर दिया और पुलहाश्रम (हरिहरक्षेत्र) में जाकर भजन में लग गए । एक दिन राजा से ऋषि बने भरत गण्डकी नदी में स्नान करके संध्या कर रहे थे । उसी समय एक गर्भवती हरिणी नदी में जल पीने के लिए आयी । हिरणी पानी पी ही रही थी कि कहीं पास में सिंह ने जोर से गर्जना की । भयवश हिरणी पानी पीना छोड़कर जोर से छलांग लगाकर भागी । प्रसव का समय पास ही होने से भय के कारण और जोर से उछलने से उसका गर्भ मृगशावक बाहर निकल गया और नदी में बहने लगा । हिरणी ने इस आघात से थोड़ी दूर जाकर प्राण त्याग दिए । हाल ही में जन्मा मृगशावक भी मरणासन्न था । राजर्षि भरत को उस पर दया आ गयी और वे उसे उठाकर अपने आश्रम में ले आए ।मोह है सभी दु:खों का मूलमोह सब व्याधिन कर मूलातिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।।मोह या आसक्ति ही मनुष्य के समस्त दु:खों का कारण है । राजर्षि भरत ने मरणासन्न मृगछौने पर दया करके उसकी रक्षा की, यह तो बड़े पुण्य का कार्य था परन्तु धीरे-धीरे इसमें एक दोष उत्पन्न हो गया, यह उनको पता ही न चला । उस मृगशावक से उन्हें मोह हो गया । कहां वे भूमण्डल का राज्य, पत्नी, पांच पुत्रों के मोह को एक पल में त्याग कर वन में आ गए थे, लेकिन अब अनजान हिरणी के बच्चे में इतने आसक्त हो गए कि सारा समय उसकी देखभाल में ही बिताने लगे ।मनुष्य दया करे, प्रेम करे, दूसरों का हित करे पर कहीं पर भी बंधन नहीं बांधना चाहिए, मोह नहीं करना चाहिए । मृगशावक बड़ा हो गया, हृष्ट-पुष्ट हो गया, राजर्षि का कर्तव्य पूरा हो गया । लेकिन मृगशावक के मोह ने उन्हें उसे स्वतन्त्र करने से रोक दिया । वह भी बच्चे की तरह राजर्षि को प्यार करने लगा ।सबको अपना ग्रास बनाने वाली मृत्यु ने राजर्षि भरत का भी द्वार खटखटा दिया, उनका अंतिम समय आ गया । मृगशावक उनके पास ही उदास बैठा उन्हीं को निहार रहा था और राजा भरत का शरीर भी मृगशावक को देखते हुए उसकी चिन्ता में छूटा । इसका फल यह हुआ कि अन्तकाल की भावना के अनुसार साधारण मनुष्यों की तरह दूसरे जन्म में उन्हें मृगशरीर ही मिला।तुलसी ममता राम सों समता सब संसार ।राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ।।इसलिए मनुष्य को आरम्भ से ही भगवान में मन लगाना चाहिए । यदि मन के आकर्षण के केन्द्र भगवान बन जाएं, तो मरते समय भी वही याद आएंगे ।गीता (८।७) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होगा ।’इसी भाव को प्रकट करता हुआ एक सुन्दर भजन है—इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकलें,गोविन्द नाम लेकर, फिर प्राण तन से निकलें ।श्रीगंगाजी का तट हो, यमुना का वंशीवट हो,मेरा सांवरा निकट हो, जब प्राण तन से निकले ।।पीताम्बरी कसी हो, छवि मन में यह बसी हो,होठों पे कुछ हंसी हो, जब प्राण तन से निकले ।श्रीवृन्दावन का स्थल हो, मेरे मुख में तुलसी दल हो,विष्णु चरण का जल हो, जब प्राण तन से निकलें ।।जब कंठ प्राण आवे, कोई रोग ना सतावे,यम दर्श ना दिखावे, जब प्राण तन से निकले ।उस वक़्त जल्दी आना, नहीं श्याम भूल जाना,राधा को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले ।।सुधि होवे नाही तन की, तैयारी हो गमन की,लकड़ी हो ब्रज के वन की, जब प्राण तन से निकले ।। एक भक्त की है अर्जी, खुदगर्ज की है गरजी,आगे तुम्हारी मर्जी, जब प्राण तन से निकले ।ये नेक सी अरज है, मानो तो क्या हरज है,कुछ आप का फरज है, जब प्राण तन से निकले ।।


गीता के अनुसार, जीव संसार में लौट कर क्यों आता है ?

By वनिता कासनियां पंजाब

गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अन्तकाल के चिंतन का महत्व बतलाते हुए अर्जुन को निरन्तर अपना चिंतन करने की आज्ञा देते हैं ।

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय ।। (गीता ८।५)

अर्थात्—जो पुरुष अन्तकाल में मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है—इसमें कुछ संशय नहीं है।

मनुष्य को जीवन में जिससे आसक्ति या मोह होता है, या उसके मन का सबसे अधिक आकर्षण जहां है, अंत समय में उसे वही स्मरण होगा । मृत्यु के समय मनुष्य सबसे अंत में जो विचार करता है अथवा जिसका चिन्तन करता है, उसका अगला जन्म उसी प्रकार का होता है ।

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ।। (गीता ८।६)

अर्थात्—हे कुन्तीपुत्र ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।

जीव संसार में लौट कर क्यों आता है ?
संसार की चीजों जैसे—घर, परिवार, जमीन, पत्नी, पुत्र, पशु-पक्षी आदि में अपनापन, ममता या आसक्ति कर लेने से मनुष्य का मन संसार में बंध जाता है तो फिर भगवान उसको वैसा ही मौका दे देते हैं अर्थात् शरीर छूटने पर ममता के कारण संसार में जन्म दे देते हैं और जीव को विवश होकर संसार में लौटकर आना पड़ता है । किन्तु जिसको सांसारिक चीजों में आसक्ति न होकर भगवान से प्रेम है, वह भगवान को प्राप्त हो जाता है ।

राजा भरत की कथा!!!!!!!

भगवान ऋषभदेव के पुत्र सम्राट भरत महान त्यागी, भगवद्भक्त व पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट थे । उनके नाम पर ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा । पहले इस देश का नाम अजनाभवर्ष था । अंत समय में मृगशावक (हिरन के बच्चे) का स्मरण करने से उन्हें अगले जन्म में मृग होना पड़ा ।

समस्त भूमण्डल के सम्राट भरत ने भगवान के भजन के लिए राज्य का त्याग कर दिया और पुलहाश्रम (हरिहरक्षेत्र) में जाकर भजन में लग गए । एक दिन राजा से ऋषि बने भरत गण्डकी नदी में स्नान करके संध्या कर रहे थे । उसी समय एक गर्भवती हरिणी नदी में जल पीने के लिए आयी । हिरणी पानी पी ही रही थी कि कहीं पास में सिंह ने जोर से गर्जना की । भयवश हिरणी पानी पीना छोड़कर जोर से छलांग लगाकर भागी । प्रसव का समय पास ही होने से भय के कारण और जोर से उछलने से उसका गर्भ मृगशावक बाहर निकल गया और नदी में बहने लगा । हिरणी ने इस आघात से थोड़ी दूर जाकर प्राण त्याग दिए । हाल ही में जन्मा मृगशावक भी मरणासन्न था । राजर्षि भरत को उस पर दया आ गयी और वे उसे उठाकर अपने आश्रम में ले आए ।

मोह है सभी दु:खों का मूल
मोह सब व्याधिन कर मूला
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।।

मोह या आसक्ति ही मनुष्य के समस्त दु:खों का कारण है । राजर्षि भरत ने मरणासन्न मृगछौने पर दया करके उसकी रक्षा की, यह तो बड़े पुण्य का कार्य था परन्तु धीरे-धीरे इसमें एक दोष उत्पन्न हो गया, यह उनको पता ही न चला । उस मृगशावक से उन्हें मोह हो गया । कहां वे भूमण्डल का राज्य, पत्नी, पांच पुत्रों के मोह को एक पल में त्याग कर वन में आ गए थे, लेकिन अब अनजान हिरणी के बच्चे में इतने आसक्त हो गए कि सारा समय उसकी देखभाल में ही बिताने लगे ।

मनुष्य दया करे, प्रेम करे, दूसरों का हित करे पर कहीं पर भी बंधन नहीं बांधना चाहिए, मोह नहीं करना चाहिए । मृगशावक बड़ा हो गया, हृष्ट-पुष्ट हो गया, राजर्षि का कर्तव्य पूरा हो गया । लेकिन मृगशावक के मोह ने उन्हें उसे स्वतन्त्र करने से रोक दिया । वह भी बच्चे की तरह राजर्षि को प्यार करने लगा ।

सबको अपना ग्रास बनाने वाली मृत्यु ने राजर्षि भरत का भी द्वार खटखटा दिया, उनका अंतिम समय आ गया । मृगशावक उनके पास ही उदास बैठा उन्हीं को निहार रहा था और राजा भरत का शरीर भी मृगशावक को देखते हुए उसकी चिन्ता में छूटा । इसका फल यह हुआ कि अन्तकाल की भावना के अनुसार साधारण मनुष्यों की तरह दूसरे जन्म में उन्हें मृगशरीर ही मिला।

तुलसी ममता राम सों समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ।।

इसलिए मनुष्य को आरम्भ से ही भगवान में मन लगाना चाहिए । यदि मन के आकर्षण के केन्द्र भगवान बन जाएं, तो मरते समय भी वही याद आएंगे ।

गीता (८।७) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होगा ।’

इसी भाव को प्रकट करता हुआ एक सुन्दर भजन है—

इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकलें,
गोविन्द नाम लेकर, फिर प्राण तन से निकलें ।
श्रीगंगाजी का तट हो, यमुना का वंशीवट हो,
मेरा सांवरा निकट हो, जब प्राण तन से निकले ।।
पीताम्बरी कसी हो, छवि मन में यह बसी हो,
होठों पे कुछ हंसी हो, जब प्राण तन से निकले ।
श्रीवृन्दावन का स्थल हो, मेरे मुख में तुलसी दल हो,
विष्णु चरण का जल हो, जब प्राण तन से निकलें ।।
जब कंठ प्राण आवे, कोई रोग ना सतावे,
यम दर्श ना दिखावे, जब प्राण तन से निकले ।
उस वक़्त जल्दी आना, नहीं श्याम भूल जाना,
राधा को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले ।।
सुधि होवे नाही तन की, तैयारी हो गमन की,
लकड़ी हो ब्रज के वन की, जब प्राण तन से निकले ।।
एक भक्त की है अर्जी, खुदगर्ज की है गरजी,
आगे तुम्हारी मर्जी, जब प्राण तन से निकले ।
ये नेक सी अरज है, मानो तो क्या हरज है,
कुछ आप का फरज है, जब प्राण तन से निकले ।।

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नृसिंह जयंती सभी भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएँ जय जय लक्ष्मी नारायण हरे.........#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️नृसिंह जयंती वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस जयंती का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। भगवान श्रीनृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं। पौराणिक धार्मिक मान्यताओं एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने 'नृसिंह अवतार' लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। भगवान विष्णु ने अधर्म के नाश के लिए कई अवतार लिए तथा धर्म की स्थापना की।कथा :-नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है। नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। धर्म ग्रंथों में भगवान विष्णु के इस अवतरण की कथा इस प्रकार है-प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे, उनकी पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम 'हरिण्याक्ष' तथा दूसरे का 'हिरण्यकशिपु ' था।हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह रूप धरकर मार दिया था। अपने भाई कि मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया। सहस्त्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। लोकपालों को मारकर भगा दिया और स्वत: सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरूपाय हो गए थे। वह असुर हिरण्यकशिपु को किसी प्रकार से पराजित नहीं कर सकते थे।भक्त प्रह्लाद का जन्म :-अहंकार से युक्त हिरण्यकशिपु प्रजा पर अत्याचार करने लगा। इसी दौरान हिरण्यकशिपु कि पत्नीकयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम 'प्रह्लाद ' रखा गया। एक राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद में राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण मौजूद नहीं थे तथा वह भगवान नारायण का भक्त था। वह अपने पिता हिरण्यकशिपु के अत्याचारों का विरोध करता था।हिरण्यकशिपु का वध :-भगवान-भक्ति से प्रह्लाद का मन हटाने और उसमें अपने जैसे दुर्गुण भरने के लिए हिरण्यकशिपु ने बहुत प्रयास किए। नीति-अनीति सभी का प्रयोग किया, किंतु प्रह्लाद अपने मार्ग से विचलित न हुआ। तब उसने प्रह्लाद को मारने के लिए षड्यंत्र रचे, किंतु वह सभी में असफल रहा। भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद हर संकट से उबर आता और बच जाता था। अपने सभी प्रयासों में असफल होने पर क्षुब्ध हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अपनी बहनहोलिका की गोद में बैठाकर जिन्दा ही जलाने का प्रयास किया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती, परंतु जब प्रह्लाद को होलिका की गोद में बिठा कर अग्नि में डाला गया तो उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई, किंतु प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ। इस घटना को देखकर हिरण्यकशिपु क्रोध से भर गया। उसकी प्रजा भी अब भगवान विष्णु की पूजा करने लगी थी। तब एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि बता- "तेरा भगवान कहाँ है?" इस पर प्रह्लाद ने विनम्र भाव से कहा कि "प्रभु तो सर्वत्र हैं, हर जगह व्याप्त हैं।" क्रोधित हिरण्यकशिपु ने कहा कि "क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ (खंभे) में भी है?" प्रह्लाद ने हाँ में उत्तर दिया। यह सुनकर क्रोधांध हिरण्यकशिपु ने खंभे पर प्रहार कर दिया। तभी खंभे को चीरकर श्रीनृसिंह भगवान प्रकट हो गए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जाँघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ डाला और उसका वध कर दिया। श्रीनृसिंह ने प्रह्लाद कीभक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि आज के दिन जो भी मेरा व्रत करेगा, वह समस्त सुखों का भागी होगा एवं पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त होगा। अत: इस कारण से इस दिन को "नृसिंह जयंती-उत्सव" के रूप में मनाया जाता है।नृसिंह भगवान के चर्म को बना लिया भोले ने अपना आसन :-इसके अलावा एक अन्य वजह भी है, जिसके लिए भगवान विष्णु ने ये रूप धरा। बताया जाता है कि हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भगवान नृसिंह का क्रोध शांत ही नहीं हो रहा था। वे पृथ्वी को नष्ट कर देना चाहते हैं। इस बात से परेशान सभी देवता भोलेनाथ की शरण में गए। भोलेनाथ ने नरसिंह भगवान का गुस्सा शांत करने के लिए अपने अंश से उत्पन्न वीरभद्र को भेजा। वीरभ्रद ने काफी कोशिश की, लेकिन जब भगवान नृसिंह नहीं माने तो उन्होंने वीरभद्र गरूड़, सिंह और मनुष्य का मिश्रित शरभ रूप धारण किया।शरभ ने नृसिंह को अपने पंजे से उठा लिया और चोंच से वार करने लगा। शरभ के वार से आहत होकर नृसिंह ने अपना शरीर त्यागने का निर्णय लिया और शिव से निवेदन किया कि इनके चर्म को शिव अपने आसन के रूप में स्वीकार करें। इसके बाद शिव ने इनके चर्म को अपना आसन बना लिया। इसलिए शिव वाघ के खाल पर विराजते हैं। इस दिन जो भी व्यक्ति भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करता है, उसे सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्ति पाकर मोक्ष की भी प्राप्ति करता है। भगवान नृसिंह की पूजा के लिए फल, फूल और पंचमेवा का भोग लगाना चाहिए। इसके साथ ही भगवान नृसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके नृसिंह गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।व्रत विधि :-नृसिंह जयंती के दिन व्रत-उपवास एवं पूजा-अर्चना कि जाती है। इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए तथा भगवान नृसिंह की विधी विधान के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भगवान नृसिंह तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित करना चाहिए, तत्पश्चात् वेद मंत्रों से इनकी प्राण-प्रतिष्ठा कर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए। भगवान नृसिंह की पूजा के लिए फल , पुष्प , पंचमेवा, कुमकुम, केसर, नारियल , अक्षत व पीताम्बर रखना चाहिए। गंगाजल , काले तिल, पंच गव्य व हवन सामग्री का पूजन में उपयोग करें। भगवान नृसिंह को प्रसन्न करने के लिए उनके नृसिंह गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए। पूजा के पश्चात् एकांत में कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से नृसिंह भगवान के मंत्र का जप करना चाहिए। इस दिन व्रती को सामर्थ्य अनुसार तिल , स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए। इस व्रत को करने वाला व्यक्ति लौकिक दुःखों से मुक्त हो जाता है। भगवान नृसिंह अपने भक्त की रक्षा करते हैं व उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।#Vnita🙏🙏❤️मंत्र :-नृसिंह #जयंती के दिन निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए-1. ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्॥2. ॐ नृम नृम नृम नर सिंहाय नमः ।इन #मंत्रों का #जाप करने से समस्त #दुखों का निवारण होता है तथा #भगवान #नृसिंह की कृपा प्राप्त होती है।❤️ राधे राधे ❤️

नृसिंह जयंती सभी भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएँ  जय जय लक्ष्मी नारायण हरे......... #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ नृसिंह जयंती वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस जयंती का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। भगवान श्रीनृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं। पौराणिक धार्मिक मान्यताओं एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने 'नृसिंह अवतार' लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। भगवान विष्णु ने अधर्म के नाश के लिए कई अवतार लिए तथा धर्म की स्थापना की। कथा :- नृसिंह अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है। नरसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। धर्म ग्रंथों में भगवान विष्णु के इस अवतरण की कथा इस प्रकार है- प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे, उनकी पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम 'हरिण्याक्ष' तथा दूसरे का 'हिरण्यकशिपु ' था। हिरण्याक्ष...